ये गुरुर बेटों का हैं, या फिर आँखों में शर्म नहीं?

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बदहवाश एक जान को, ज़िन्दगी की जंग लड़ते देखा हैं?
हाँ मेरे हाथो में भी, खिंची कुछ वैसी ही रेखा हैं,
कुछ बदशक्ल सी हैं ज़िन्दगी, अपनों के ही दंश से,
गुरुर उनको सिर्फ इसका हैं, सब चल रहा हैं उनके वंश से।

जलाई जा रही हूँ हर रोज, बदज़ुबानी की आग से,
कमबख्त कौन सी वो चीज़ हैं, जिसे पाने के लिए जीती हूँ,
घिरी अपनों से हूँ लेकिन, पराई मेरी काया हैं,
मुझे हररोज़ उन्हीं हाथों ने, रह-रह कर जलाया हैं।

दफनाई जा रही हैं हर-लम्हा, मेरी हसरतों की दुनिया,
खुली आँखों में मैंने भी तो, अपना आशियाना सजाया हैं,
कुछ ज़मी कम पड़ गयी, या कुछ कदम ठहर गये,
शायद ये ‘सब्र’ हैं मेरा, या ‘बेशर्म’ हम बन गये।

पराई दुनिया को छोड़कर, पराई दुनिया में आई हूँ,
कमी इतनी सी हैं ‘माही’, पहले ‘बेटी’ और आज ‘बहु’ होकर पराई हूँ,
हँसते हो रुलाकर मुझे, मुझे इसका भी गम नहीं,
ये गुरुर ‘बेटों, का हैं, या फिर ‘आँखों’ में शर्म नहीं?
या फिर ‘आँखों’ में शर्म नहीं?

मंजूमाहीराज
दिनांक: 28 जुलाई, 2016

http://www.mahiraj.wordpress.com
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