आज मैं सिर्फ एक बहु हू

बहु को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो

बहु  को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो,
अपनों की थाली में कभी, खिला कर तो देखो,
बहुत सजाएं हैं सपने, उसने भी आँखों में,
उसकी उम्मीद को भी पंख, लगा कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो,

बहुत हँसती हैं वो देखो, भीगी आँख से  लेकिन,
कभी उसके भी ज़ख्मो पर, मरहम लगा कर तो देखो,
नहीं कहती हैं वो कुछ भी, बहुत जान कर सबको,
उसके भी होंटों पर, लफ्ज़ सजाकर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,

सिकवा नहीं हैं उसको, अपनों के छूट जाने का,
हाँ दर्द हैं बहुत, अपनों के ठुकराने का,
कभी ममता का आँचल, उसके सर पर ड़ाल कर तो देखो,
अपनों की तरह उसको भी अपना, मान कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,

क्यों रोती हैं वो अपनों के लिये, अपनों के ही घर में,
बहते हुयें अश्कों को उसके, पहचान कर तो देखो,
नहीं सँवरी  हैं वो, सँवार कर, बेजान चेहरों को,
कभी रिश्तों के तराज़ू से, उसे उतार कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,
अपनों की थाली में कभी, खिला कर तो देखो……..

मंजू ” माहीराज”
दिनांक : 22 अगस्त 2012

क्यू बेटी से बहु, बनाई जाती हैं बेटियां

क्यू बेटी से बहु, बनाई जाती हैं बेटियां,
क्यू अपनों से पराई, कहलाती हैं बेटियां,
क्यू अपना कर अनजान रिश्तो को,
उसी रंग में खो जाती हैं बेटियां,
क्यू बेटो की हर गलती की सज़ा पाती हैं बेटियां,

कभी रूठ कर ममता के आँचल में, मुह छुपाती थी जो बेटियां,
क्यू बन कर शोभा किसी आँगन की, उस आँचल को तरस जाती हैं बेटियां,
कभी माँ की लाडली, बापू की दुलारी, कहलाती थी जो बेटियां,
क्यू खोकर खुदको बहु-भाभी, बन कर रह जाती हैं बेटियां,

क्यू रिश्तों के तराज़ू में सिर्फ, तोली जाती हैं बेटियां,
क्यू बहु से बेटी और आँखों का तारा, नहीं बनाई जाती हैं बेटियां,
क्यू सबकी आँखों में खुशियाँ देकर, खुद खुश हो जाती हैं बेटियां,
क्यू उसके ही सपने टूटते हैं, क्यू मुरझा जाती हैं बेटियां,

मैं तलाश में हूँ उस बाग के, जिसमें बहु से बेटी बनाई जाती हैं बेटियां,
मैं थकी नहीं ”हाँ” निराश हूँ, क्यू हर रूप में नहीं अपनाई जाती हैं बेटियां

मंजू “माहीराज”
दिनाक 26 june 2012