क्यू बेटी से बहु, बनाई जाती हैं बेटियां

क्यू बेटी से बहु, बनाई जाती हैं बेटियां,
क्यू अपनों से पराई, कहलाती हैं बेटियां,
क्यू अपना कर अनजान रिश्तो को,
उसी रंग में खो जाती हैं बेटियां,
क्यू बेटो की हर गलती की सज़ा पाती हैं बेटियां,

कभी रूठ कर ममता के आँचल में, मुह छुपाती थी जो बेटियां,
क्यू बन कर शोभा किसी आँगन की, उस आँचल को तरस जाती हैं बेटियां,
कभी माँ की लाडली, बापू की दुलारी, कहलाती थी जो बेटियां,
क्यू खोकर खुदको बहु-भाभी, बन कर रह जाती हैं बेटियां,

क्यू रिश्तों के तराज़ू में सिर्फ, तोली जाती हैं बेटियां,
क्यू बहु से बेटी और आँखों का तारा, नहीं बनाई जाती हैं बेटियां,
क्यू सबकी आँखों में खुशियाँ देकर, खुद खुश हो जाती हैं बेटियां,
क्यू उसके ही सपने टूटते हैं, क्यू मुरझा जाती हैं बेटियां,

मैं तलाश में हूँ उस बाग के, जिसमें बहु से बेटी बनाई जाती हैं बेटियां,
मैं थकी नहीं ”हाँ” निराश हूँ, क्यू हर रूप में नहीं अपनाई जाती हैं बेटियां

मंजू “माहीराज”
दिनाक 26 june 2012