क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ!

तेरे सुने आँगन में, अश्कों से भीगे आँचल में,
तेरी झूठी हर फटकार में, फिर मिलने वाले प्यार में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

तेरी बातों की मिठास में, तेरी हर दिन और रात में,
होने वाली हर परवाह में, मिलने वाली हर दुआ में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

तुझ संग होती हर बात में, हर क्षण होती मुलाकात में,
बुनते हुए हर ख्वाब में, सच होती हुई हर बात में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

तेरी उदासी के हर छोर में, भीगी आँखों के कोर में,
नतमस्तक होती हर भोर में, दौड़ती भागती जिंदगी के शोर में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

तेरे जीवन की तरंग में, हर उठने वाली उमंग में,
रिश्तों के नाज़ुक डोर में, तेरे जीवन के हर मोड़ में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

“मैं” तेरी ही परछाई हूँ, तुझसे ही जन्म “मैं” पाई हूँ,
तेरे ममता के आँचल में, “पल” आज हुई पराई हूँ,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ,
क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ !

मंजू “माहीराज”
दिनांक: 30 अक्टूबर, 2013
समर्पित प्यारी “माँ”

(c) समस्त सामग्री कापीराइटेड है I

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हाँ मैं बोती हूँ तमन्ना….

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हाँ मैं  बोती हूँ तमन्ना, वीरान बंजर दिल की ज़मी में
हाँ मैं सजोती हूँ ख़्वाब, सुनी नम आँखों की गली में,

हाँ जागती  हूँ मैं रातों को, दिल की तन्हाई मिटाने के लिए
हाँ सिसकती हैं हर आहे, खुद को बहलाने के लिए,

हाँ हँसती हूँ मैं खुद पर, देख टूटे हुए टुकड़ों में खुदको
हाँ समेटती हूँ फिर काँपते हाथों से, अपनी ही रूह में खुदको,

हाँ अंजान थी मैं, नाज़ों नखरों और दुनियाँ  की नुमाईश से
हाँ  छुपाती थी खुद को और  हसरतों को, अपनी ही परछाई से,

हाँ बोती हूँ मैं बंजर ज़मी में
तमन्ना और ख़्वाबो के सूखे बीज़|

मंजू”माहीराज”