हाँ मैं बोती हूँ तमन्ना….

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हाँ मैं  बोती हूँ तमन्ना, वीरान बंजर दिल की ज़मी में
हाँ मैं सजोती हूँ ख़्वाब, सुनी नम आँखों की गली में,

हाँ जागती  हूँ मैं रातों को, दिल की तन्हाई मिटाने के लिए
हाँ सिसकती हैं हर आहे, खुद को बहलाने के लिए,

हाँ हँसती हूँ मैं खुद पर, देख टूटे हुए टुकड़ों में खुदको
हाँ समेटती हूँ फिर काँपते हाथों से, अपनी ही रूह में खुदको,

हाँ अंजान थी मैं, नाज़ों नखरों और दुनियाँ  की नुमाईश से
हाँ  छुपाती थी खुद को और  हसरतों को, अपनी ही परछाई से,

हाँ बोती हूँ मैं बंजर ज़मी में
तमन्ना और ख़्वाबो के सूखे बीज़|

मंजू”माहीराज”

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क्यूँ…..

क्यूँ रात के पीछे भागता हैं दिन
क्यूँ दिन को डुबोता हैं तपिश भरा सूरज,

क्यूँ चाँदनी मचलती हैं देख चाँद को
क्यूँ चाँद ख़ौफज़दा हैं रात  अमावश से,

क्यूँ  पूरवाई चलती हैं बदमस्त बहारों में
क्यूँ सहम जाती हैं पवन रेतीली फ़िज़ओ में,

क्यूँ आँखो से झाँकता हैं सपना जागती रातों में
क्यूँ खो जाती हैं तमन्ना खुले आकाश में,

क्यूँ बिखर जाते हैं  लम्हें टकराकर यादों से
क्यूँ सिमट नही पाती  सदीयाँ  एक  लम्हें में,

क्यूँ बंज़र ज़मी देखती हैं राह बादलों की बरसात में
क्यूँ गीली ज़मी पर बरसता हैं सावन, सावन के बाद

मंजू”माहीराज”