बहुत समझा मुझे तुमने, की कुछ समझा ही नहीं!

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हूँ बेगुनाह मैं, या गुनेहगार हूँ तुझ संग,
तू झाँक खुद के सीने में, फिर जवाब दे मुझको!

आँखो के हसीन ख्वाब, हक़ीकत की ज़मी पे बिखर गये,
तू झाँक खुद की नज़रो में, फिर जवाब दे मुझको!

चन्द कदमो के तेरे साथ ने, मुझको थका दिया,
तू देख खुद की ज़मी, फिर जवाब दे मुझको!

तेरे प्यार में ‘माही’, टूटी है कई बार,
तू देख खुद के हौसले, फिर जवाब दे मुझको!

बहुत समझा मुझे तुमने, कि कुछ समझा ही नहीं ‘राज’,
फिर भी कहती हैं ये ‘माही’, आज जवाब दे मुझको!
आज जवाब दे मुझको!

मंजू “माहीराज”
दिनांक: 26 फ़रवरी, 2016
http://www.mahiraj.wordpress.com
(c) समस्त सामग्री कापीराइटेड है

 

 

 

 

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हाँ मैं बोती हूँ तमन्ना….

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हाँ मैं  बोती हूँ तमन्ना, वीरान बंजर दिल की ज़मी में
हाँ मैं सजोती हूँ ख़्वाब, सुनी नम आँखों की गली में,

हाँ जागती  हूँ मैं रातों को, दिल की तन्हाई मिटाने के लिए
हाँ सिसकती हैं हर आहे, खुद को बहलाने के लिए,

हाँ हँसती हूँ मैं खुद पर, देख टूटे हुए टुकड़ों में खुदको
हाँ समेटती हूँ फिर काँपते हाथों से, अपनी ही रूह में खुदको,

हाँ अंजान थी मैं, नाज़ों नखरों और दुनियाँ  की नुमाईश से
हाँ  छुपाती थी खुद को और  हसरतों को, अपनी ही परछाई से,

हाँ बोती हूँ मैं बंजर ज़मी में
तमन्ना और ख़्वाबो के सूखे बीज़|

मंजू”माहीराज”