बगिया में खिला फूल कभी, कांटो की चुभन ना बन जाए !

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माँ का आँचल है बगिया, तो बापू माली सा दिखता है
बचपन का दुलार, क्यों जवानी में चुभता हैI

नन्हें कदमों की डगमगाहट, उँगली थाम कर सम्भलती है
क्यों जवानी में वो हथेली, हाथों से फिसलती हैI

जिनके सपनों को सजानें में, खुद की जवानी पिघलती है,
क्योँ उनकी तस्वीरों में, गैरों की परछाई सँवरती हैI

क्योँ झुरियों भरे चेहरे से वो आज भागते है
बचपन में जिसे प्यार से, वो माँ-बाबा पुकारते हैI

हैं कोशिश मैं सींचू वो बाग़, जिसका माली ना मुरझा पाएं,
बगिया में खिला फूल कभी, कांटो की चुभन ना बन जाए I

मंजू”माहीराज”
दिनांक: ०२-मार्च-2014
समर्पित नानी जी
http://www.mahiraj.wordpress.com

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