थक गयी हुँ मैं मगर, टूटी नहीं हुँ जिंदगी !

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बहुत हसरतों से मैंने सज़ाई थी जिंदगी,
हर रिश्तों को रेशम धागे में, पिराई थी जिंदगी,
सज़ाने को चन्द उम्मीद, और ख़्वाहिश थी मेरे पास,
जिनकी सिसकियों से ही, डगमगाई थी जिंदगी!

न मैं कह सकी सबसे, न अपनों ने सुनी आवाज़,
पत्थर दिलों से मिलकर, पत्थराई थी जिंदगी,
मैं सोचती हुँ जितना, उतना ही टूट जाती हुँ,
क्योँ इस मोड़ पर मुझे यू, ले आई थी जिंदगी!

मेरा साया ही मुझको आज यू, मायूस कर गया,
हैँ आँसुओं की झील मेँ, डबडबाई थी जिंदगी,
हैँ उम्मीद अब भी बाकी, सीने मेँ दबी हुई,
थक गई हुँ मैं मगर, टूटी नहीं हुँ जिंदगी,
टूटी नहीं हुँ जिंदगी!

मंजू “माहीराज”
दिनांक: 11 नवम्बर, 2014
http://www.mahiraj.wordpress.com
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