बहुत समझा मुझे तुमने, की कुछ समझा ही नहीं!

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हूँ बेगुनाह मैं, या गुनेहगार हूँ तुझ संग,
तू झाँक खुद के सीने में, फिर जवाब दे मुझको!

आँखो के हसीन ख्वाब, हक़ीकत की ज़मी पे बिखर गये,
तू झाँक खुद की नज़रो में, फिर जवाब दे मुझको!

चन्द कदमो के तेरे साथ ने, मुझको थका दिया,
तू देख खुद की ज़मी, फिर जवाब दे मुझको!

तेरे प्यार में ‘माही’, टूटी है कई बार,
तू देख खुद के हौसले, फिर जवाब दे मुझको!

बहुत समझा मुझे तुमने, कि कुछ समझा ही नहीं ‘राज’,
फिर भी कहती हैं ये ‘माही’, आज जवाब दे मुझको!
आज जवाब दे मुझको!

मंजू “माहीराज”
दिनांक: 26 फ़रवरी, 2016
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मुझमें दीवानगी भर दे…….

3

कोई आकर मुझे वो मंज़र वो शाम फिर दिखा दे
मुझे ख़्वाहिश हैं जिस ख़्वाब की, मेरी पलकों में सज़ा दे,

ना पूछे देखकर मुझको मेरा वो हाले दिल,
पढ़े आँखो को बस मेरी और लफ़्ज़ों में बया कर दे,

जो देखे मुड़कर भी मुझको लौटते कदमों से पीछे,
हो कशिश यू आँखों में जो मुझको बेहया कर दे,

दबे पाँव चला आए मेरी ख़्वाबों की दुनियाँ में,
सज़ा कर चाँद आँखों में हर रात पूर्णिमा कर दे,

मेरी चाहत है हर लम्हा मेरा दीवाना हो ऐसा,
बसा कर मुझको सांसो में मुझमें दीवानगी भर  दे,

मंजू”माहीराज”

क्यूँ…..

क्यूँ रात के पीछे भागता हैं दिन
क्यूँ दिन को डुबोता हैं तपिश भरा सूरज,

क्यूँ चाँदनी मचलती हैं देख चाँद को
क्यूँ चाँद ख़ौफज़दा हैं रात  अमावश से,

क्यूँ  पूरवाई चलती हैं बदमस्त बहारों में
क्यूँ सहम जाती हैं पवन रेतीली फ़िज़ओ में,

क्यूँ आँखो से झाँकता हैं सपना जागती रातों में
क्यूँ खो जाती हैं तमन्ना खुले आकाश में,

क्यूँ बिखर जाते हैं  लम्हें टकराकर यादों से
क्यूँ सिमट नही पाती  सदीयाँ  एक  लम्हें में,

क्यूँ बंज़र ज़मी देखती हैं राह बादलों की बरसात में
क्यूँ गीली ज़मी पर बरसता हैं सावन, सावन के बाद

मंजू”माहीराज”

आँखो में बसाया तुमको, तो आँसुओ को पाया..

आँखो में बसाया तुमको, तो आँसुओ को पाया,
ख़्वाबो में सजाया तुमको, तो  तन्हा रातों को पाया,
हर मोड़ पर खुशियाँ ढूढ़तें थे, तेरी ख़ातिर,
ओर बदले में गमों की सौगातों को पाया.

मंजू”माहीराज”

अश्क उसकी आँखो में थे..

जो मिटाने चला वो, दिले-वर्क से मेरा नाम,
एक बूँद ही सही, अश्क उसकी आँखो में थे

मंजू”माहीराज”

मैं जानती हू वो ज़िंदा हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे..

मैं जानती हू वो ज़िंदा  हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे,
जो हँस रहा हैं मुझ पर, उसकी आँखो में अश्क मैं लाऊ कैसे,
बड़ी बेतकल्लुफि से तोड़ा था, मेरा दिल जिसने,
उस शक्स को अपना, दर्दो-गम मैं जताऊ कैसे,
मैं जानती हू वो ज़िंदा हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे

अक्सर छलक पड़ता हैं वो, आँखो से अश्क बनके,
उसके इस अक्श को, ज़माने  से मैं छुपाऊ कैसे,
मैं जानती हू वो ज़िंदा हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे,

उसने तो दफ़ना दिया, मेरी हर याद को,
मैं उसकी अस्थियो में, आग लगाऊ कैसे,
जो बट रहा हैं गैरो में, उसकी याद इस दिल से में मिटाऊ कैसे,
मैं जानती हू वो ज़िंदा हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे
जो हँस रहा हैं मुझपर, उसकी आँखो में अश्क  मैं लाऊ कैसे

मंजू”माहीराज”

सुना था टूट जाते हैं ख्वाब..

सुना था टूट जाते हैं ख्वाब,
जो आँखो में बसाया, तो जाना,
सुना था छूट जाता हैं हाथ,
जो तुम्हे थमाया, तो जाना,
शम्मा की रोशनी से क्यू कायम हैं महफ़िल,
जो एक चिराग बुझाया, तो जाना

मंजू”माहीराज”