मुझमें दीवानगी भर दे…….

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कोई आकर मुझे वो मंज़र वो शाम फिर दिखा दे
मुझे ख़्वाहिश हैं जिस ख़्वाब की, मेरी पलकों में सज़ा दे,

ना पूछे देखकर मुझको मेरा वो हाले दिल,
पढ़े आँखो को बस मेरी और लफ़्ज़ों में बया कर दे,

जो देखे मुड़कर भी मुझको लौटते कदमों से पीछे,
हो कशिश यू आँखों में जो मुझको बेहया कर दे,

दबे पाँव चला आए मेरी ख़्वाबों की दुनियाँ में,
सज़ा कर चाँद आँखों में हर रात पूर्णिमा कर दे,

मेरी चाहत है हर लम्हा मेरा दीवाना हो ऐसा,
बसा कर मुझको सांसो में मुझमें दीवानगी भर  दे,

मंजू”माहीराज”

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बदलते रिश्ते….

01 रिश्ते बड़े नाज़ुक, बड़े चंचल, बड़े रंगीले होते हैं,
आज हैं साथ, तो कल हम अकेले होते हैं,

बड़ी ही बेपाकी से बढ़ाते हैं, हाथ निभाने के लिए,
एक पल की रोशनी, तो कल हम अँधेरे में होते हैं,

कभी एक दोस्त, एक साथी और एक हमसफर बनकर,
ना जाने कौन सा रंग हैं, हम हर रंग को ढोते हैं,

नही कुछ भी सिवा धोखा और तकलीफ़ के इसमें,
कल अकेले में हँसते थे, आज संग होकर भी रोते हैं,

नही समझाई क्यू हमको, किसी ने रिश्तों की दौलत,
कभी लुटाते थे हम सब पर, आज पाकर भी खोते हैं,

हैं एक शीशा दिखाने को, ज़माने के  दिखावे में,
कभी अक्श हंस दिया हम पे, कभी हम अक्श पर रोते हैं,
बदलते हर लम्हा रिश्ते, कितने रिश्तों को खोते हैं,

मंजू”माहीराज”

क्यूँ…..

क्यूँ रात के पीछे भागता हैं दिन
क्यूँ दिन को डुबोता हैं तपिश भरा सूरज,

क्यूँ चाँदनी मचलती हैं देख चाँद को
क्यूँ चाँद ख़ौफज़दा हैं रात  अमावश से,

क्यूँ  पूरवाई चलती हैं बदमस्त बहारों में
क्यूँ सहम जाती हैं पवन रेतीली फ़िज़ओ में,

क्यूँ आँखो से झाँकता हैं सपना जागती रातों में
क्यूँ खो जाती हैं तमन्ना खुले आकाश में,

क्यूँ बिखर जाते हैं  लम्हें टकराकर यादों से
क्यूँ सिमट नही पाती  सदीयाँ  एक  लम्हें में,

क्यूँ बंज़र ज़मी देखती हैं राह बादलों की बरसात में
क्यूँ गीली ज़मी पर बरसता हैं सावन, सावन के बाद

मंजू”माहीराज”

हमे भी ज़िद हैं..

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हमे भी ज़िद हैं आसमाँ से एक तारा हम लेकर रहेंगें,
कभी डुबोया था साहिल ने किनारा हम लेकर रहेंगें,
ना खिलने दिया था फूल जिस उपवन में माली ने,
अगली बहार में उस गुलशन का नज़ारा हम लेकर रहेंगें

मंजू”माहीराज”

कोशिश…

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बूझते सूरज से एक चिराग़ जलाने की कोशिश की हमने
रात अमावस से अंधेरा मिटाने की कोशिश की हमने
बारिश की चंद  बूँदो में सागर की गहराई  ढूंढी
और पतझड़ में फिर सावन को लाने की कोशिश की हमने

मंजू”माहीराज”

मुद्दतो बाद फिर तन्हाई से हमने मुलाकात की..

मुद्दतो बाद फिर तन्हाई से हमने मुलाकात की
तुझ संग बीते हर लम्हें की उससे बात की
मुस्कुरा दिए जब पूछा दिल ने कहा हैं वो
अपनी  खुशियाँ तुमने जिसके नाम की.

मंजू”माहीराज”

आँखो में बसाया तुमको, तो आँसुओ को पाया..

आँखो में बसाया तुमको, तो आँसुओ को पाया,
ख़्वाबो में सजाया तुमको, तो  तन्हा रातों को पाया,
हर मोड़ पर खुशियाँ ढूढ़तें थे, तेरी ख़ातिर,
ओर बदले में गमों की सौगातों को पाया.

मंजू”माहीराज”

किसी को पलकों पर बिठाना और फिर गिरा देना..

 

किसी को पलकों पर बिठाना और फिर गिरा देना, आप की आदत हैं,
कभी अपना बताना और फिर ठुकरा देना, आप की वफ़ा हैं,
शामिल कर किसी को अपनी ख़ुशी में रुला देना, ये आप की अदा हैं,
खुदा करें कोई आपसा आपको भी मिले, यहीं आपकी सज़ा हैं.

 मंजू”माहीराज”

तेरी खुशबू मेरे तन बदन को, आज भी महकाती हैं..

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तेरी  खुशबू मेरे तन बदन को, आज भी महकाती  हैं
तेरे उन अनछुए स्पर्श को, रोम-रोम में जगाती हैं,

कभी  हथेलियों और कभी बालो को सहलाती हैं
कभी अठखेलिया करते हुए, सांसो को बहकाती हैं,

कभी ये दूर से मचलते हुए,  अरमा जगाती हैं
कभी अधखुली आँखो में मेरी, ख्वाबो को  सजाती हैं,

कभी झींझोर कर मुझको, तेरी यादों के दामन से
तेरे ना साथ होने की चुभन, दिल में बढ़ाती हैं,

तेरी  खुशबू मेरे तन बदन को आज भी महकाती हैं……………..

मंजू”माहीराज”

फिर जा पड़े मेरे कदम

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फिर जा पड़े मेरे क़दम, उन यादों की दहलीज पे,
जहाँ बिखरे थे सब वादे, टूट कसमो की ज़ंजीर से,
था आँसुओ का दरिया जहाँ, सूनी पड़ी ज़मीन पे,
और टटोलती हैं ये नज़रें तुम्हे, एक धुंधली पड़ी तस्वीर में

मंजू”माहीराज”

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