बहु को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो

बहु  को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो,
अपनों की थाली में कभी, खिला कर तो देखो,
बहुत सजाएं हैं सपने, उसने भी आँखों में,
उसकी उम्मीद को भी पंख, लगा कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो,

बहुत हँसती हैं वो देखो, भीगी आँख से  लेकिन,
कभी उसके भी ज़ख्मो पर, मरहम लगा कर तो देखो,
नहीं कहती हैं वो कुछ भी, बहुत जान कर सबको,
उसके भी होंटों पर, लफ्ज़ सजाकर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,

सिकवा नहीं हैं उसको, अपनों के छूट जाने का,
हाँ दर्द हैं बहुत, अपनों के ठुकराने का,
कभी ममता का आँचल, उसके सर पर ड़ाल कर तो देखो,
अपनों की तरह उसको भी अपना, मान कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,

क्यों रोती हैं वो अपनों के लिये, अपनों के ही घर में,
बहते हुयें अश्कों को उसके, पहचान कर तो देखो,
नहीं सँवरी  हैं वो, सँवार कर, बेजान चेहरों को,
कभी रिश्तों के तराज़ू से, उसे उतार कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,
अपनों की थाली में कभी, खिला कर तो देखो……..

मंजू ” माहीराज”
दिनांक : 22 अगस्त 2012

Advertisements

2 Comments

  1. October 19, 2012 at 10:33 am

    Nice poem… keep writing…

  2. Sarkar said,

    March 4, 2014 at 6:33 am

    Like your all poems
    Likh nahi sakte to kya hua wah??? wah??? to kar sakte hai


Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: