हाँ मैं बोती हूँ तमन्ना….

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हाँ मैं  बोती हूँ तमन्ना, वीरान बंजर दिल की ज़मी में
हाँ मैं सजोती हूँ ख़्वाब, सुनी नम आँखों की गली में,

हाँ जागती  हूँ मैं रातों को, दिल की तन्हाई मिटाने के लिए
हाँ सिसकती हैं हर आहे, खुद को बहलाने के लिए,

हाँ हँसती हूँ मैं खुद पर, देख टूटे हुए टुकड़ों में खुदको
हाँ समेटती हूँ फिर काँपते हाथों से, अपनी ही रूह में खुदको,

हाँ अंजान थी मैं, नाज़ों नखरों और दुनियाँ  की नुमाईश से
हाँ  छुपाती थी खुद को और  हसरतों को, अपनी ही परछाई से,

हाँ बोती हूँ मैं बंजर ज़मी में
तमन्ना और ख़्वाबो के सूखे बीज़|

मंजू”माहीराज”

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5 Comments

  1. vijeta pawar said,

    August 13, 2009 at 9:12 am

    hiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii bhabi very nice poem………………

  2. विनय said,

    August 17, 2009 at 9:48 am

    बहुत ही ख़ूबसूरत नज़्म है, दिल से लिखी गयी!

  3. Raj said,

    August 21, 2009 at 8:08 am

    Mahi
    bhut kub likha hai del ko choo gai ye kavita

    Ur raj

  4. vinay said,

    September 5, 2009 at 11:10 am

    @mahi ji, buffering is slow beacause video size 12MB. or You might have connection speed below 256KBPS or have simultaneous download.

    thanks

  5. December 18, 2011 at 3:02 am

    नमस्कार मित्र आईये बात करें कुछ बदलते रिश्तों की आज कीनई पुरानी हलचल पर इंतजार है आपके आने का
    सादर
    सुनीता शानू


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