हाँ मैं बोती हूँ तमन्ना….

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हाँ मैं  बोती हूँ तमन्ना, वीरान बंजर दिल की ज़मी में
हाँ मैं सजोती हूँ ख़्वाब, सुनी नम आँखों की गली में,

हाँ जागती  हूँ मैं रातों को, दिल की तन्हाई मिटाने के लिए
हाँ सिसकती हैं हर आहे, खुद को बहलाने के लिए,

हाँ हँसती हूँ मैं खुद पर, देख टूटे हुए टुकड़ों में खुदको
हाँ समेटती हूँ फिर काँपते हाथों से, अपनी ही रूह में खुदको,

हाँ अंजान थी मैं, नाज़ों नखरों और दुनियाँ  की नुमाईश से
हाँ  छुपाती थी खुद को और  हसरतों को, अपनी ही परछाई से,

हाँ बोती हूँ मैं बंजर ज़मी में
तमन्ना और ख़्वाबो के सूखे बीज़|

मंजू”माहीराज”

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मुझमें दीवानगी भर दे…….

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कोई आकर मुझे वो मंज़र वो शाम फिर दिखा दे
मुझे ख़्वाहिश हैं जिस ख़्वाब की, मेरी पलकों में सज़ा दे,

ना पूछे देखकर मुझको मेरा वो हाले दिल,
पढ़े आँखो को बस मेरी और लफ़्ज़ों में बया कर दे,

जो देखे मुड़कर भी मुझको लौटते कदमों से पीछे,
हो कशिश यू आँखों में जो मुझको बेहया कर दे,

दबे पाँव चला आए मेरी ख़्वाबों की दुनियाँ में,
सज़ा कर चाँद आँखों में हर रात पूर्णिमा कर दे,

मेरी चाहत है हर लम्हा मेरा दीवाना हो ऐसा,
बसा कर मुझको सांसो में मुझमें दीवानगी भर  दे,

मंजू”माहीराज”

बदलते रिश्ते….

01 रिश्ते बड़े नाज़ुक, बड़े चंचल, बड़े रंगीले होते हैं,
आज हैं साथ, तो कल हम अकेले होते हैं,

बड़ी ही बेपाकी से बढ़ाते हैं, हाथ निभाने के लिए,
एक पल की रोशनी, तो कल हम अँधेरे में होते हैं,

कभी एक दोस्त, एक साथी और एक हमसफर बनकर,
ना जाने कौन सा रंग हैं, हम हर रंग को ढोते हैं,

नही कुछ भी सिवा धोखा और तकलीफ़ के इसमें,
कल अकेले में हँसते थे, आज संग होकर भी रोते हैं,

नही समझाई क्यू हमको, किसी ने रिश्तों की दौलत,
कभी लुटाते थे हम सब पर, आज पाकर भी खोते हैं,

हैं एक शीशा दिखाने को, ज़माने के  दिखावे में,
कभी अक्श हंस दिया हम पे, कभी हम अक्श पर रोते हैं,
बदलते हर लम्हा रिश्ते, कितने रिश्तों को खोते हैं,

मंजू”माहीराज”