क्यूँ…..

क्यूँ रात के पीछे भागता हैं दिन
क्यूँ दिन को डुबोता हैं तपिश भरा सूरज,

क्यूँ चाँदनी मचलती हैं देख चाँद को
क्यूँ चाँद ख़ौफज़दा हैं रात  अमावश से,

क्यूँ  पूरवाई चलती हैं बदमस्त बहारों में
क्यूँ सहम जाती हैं पवन रेतीली फ़िज़ओ में,

क्यूँ आँखो से झाँकता हैं सपना जागती रातों में
क्यूँ खो जाती हैं तमन्ना खुले आकाश में,

क्यूँ बिखर जाते हैं  लम्हें टकराकर यादों से
क्यूँ सिमट नही पाती  सदीयाँ  एक  लम्हें में,

क्यूँ बंज़र ज़मी देखती हैं राह बादलों की बरसात में
क्यूँ गीली ज़मी पर बरसता हैं सावन, सावन के बाद

मंजू”माहीराज”

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