तनहा शाम

sunset1

तनहा शाम फिर ढली, डूबते सूरज की तरहा,
रात चाँदनी की आगोश में, फिर झूमी तमन्ना सितारो की तरहा,
भोर की सतरंगी किरणों सी पुलकित होती, फिर आशाएँ मेरी,
और दौड़ती फिरती चंचल किरणों सी, मेरे मन मस्तिष्क में

मंजू”माहीराज”

उनकी याद में..

वो बेख़बर होकर हमसे, हमारे दर से गुज़र गये,
हम सर पटकते हैं दहलीज़ पर, आज भी उनकी याद में

मंजू”माहीराज”

अश्क उसकी आँखो में थे..

जो मिटाने चला वो, दिले-वर्क से मेरा नाम,
एक बूँद ही सही, अश्क उसकी आँखो में थे

मंजू”माहीराज”

मैं जानती हू वो ज़िंदा हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे..

मैं जानती हू वो ज़िंदा  हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे,
जो हँस रहा हैं मुझ पर, उसकी आँखो में अश्क मैं लाऊ कैसे,
बड़ी बेतकल्लुफि से तोड़ा था, मेरा दिल जिसने,
उस शक्स को अपना, दर्दो-गम मैं जताऊ कैसे,
मैं जानती हू वो ज़िंदा हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे

अक्सर छलक पड़ता हैं वो, आँखो से अश्क बनके,
उसके इस अक्श को, ज़माने  से मैं छुपाऊ कैसे,
मैं जानती हू वो ज़िंदा हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे,

उसने तो दफ़ना दिया, मेरी हर याद को,
मैं उसकी अस्थियो में, आग लगाऊ कैसे,
जो बट रहा हैं गैरो में, उसकी याद इस दिल से में मिटाऊ कैसे,
मैं जानती हू वो ज़िंदा हैं, मैं मातम मनाऊ कैसे
जो हँस रहा हैं मुझपर, उसकी आँखो में अश्क  मैं लाऊ कैसे

मंजू”माहीराज”

सुना था टूट जाते हैं ख्वाब..

सुना था टूट जाते हैं ख्वाब,
जो आँखो में बसाया, तो जाना,
सुना था छूट जाता हैं हाथ,
जो तुम्हे थमाया, तो जाना,
शम्मा की रोशनी से क्यू कायम हैं महफ़िल,
जो एक चिराग बुझाया, तो जाना

मंजू”माहीराज”

तेरी यादो को अगर दफनाते..

तेरी यादो को अगर दफनाते, तो दफनाते कैसे,
इस दिल को दर्दो-ओ-गम की कब्रगहा बनाते, तो बनाते कैसे,
खुशिया भी ना थी मेरे दामन में इतनी,
तेरी राहो  को सजाते, तो सजाते कैसे,
फिर भी हर दुवा में थी ज़ुस्तज़ू तुम्हारी,
ये हाले-दिल भी बताते, तो बताते कैसे

मंजू”माहीराज”