आज मैं सिर्फ एक बहु हू

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कुछ यू होता, तो अच्छा होता !

shradhanjali

कुछ यू होता, तो अच्छा होता,
आपकी दुवाओ के साथ, सर पर हाथ सदा होता,
तो अच्छा होता !

कुछ लम्हें और मिल जाते, आपको जीने के लिए,
चन्द मुलाकातें और कर पाते,
तो अच्छा होता !

यू तो भूले से कभी आपको, भुला न पाएंगे हम,
मगर यादों में न सिमट जाते,
तो अच्छा होता !

अपनो को छोड़कर, अपनो की दुनिया में चले गए,
यू अश्क आँखों में छोड़कर, ना जाते,
तो अच्छा होता !

रोती हैं ये आँखें, आपको सोच कर “छामा”,
काश की फिर, अश्क मेरे पोछ जाते,
तो अच्छा होता !

क्यों लिखा कर लाएं थे, इतनी छोटी सी ज़िन्दगी,
कुछ बहारे और देख जाते,
तो अच्छा होता !

अपनो के मसलातों में, उलझी रही ये ज़िन्दगी,
कुछ अपने लिए भी “जी” पाते,
तो अच्छा होता !

कुछ यू होता, तो अच्छा होता,
आपकी दुवाओ के साथ, सर पर हाथ सदा होता,
तो अच्छा होता !

मंजू “माहीराज”
दिनांक: 01-12-2016
समर्पित स्व0 प्यारी छामा “मौसी”
http://www.mahiraj.wordpress.com
(c) समस्त सामग्री कापीराइटेड है I

ये गुरुर बेटों का हैं, या फिर आँखों में शर्म नहीं?

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बदहवाश एक जान को, ज़िन्दगी की जंग लड़ते देखा हैं?
हाँ मेरे हाथो में भी, खिंची कुछ वैसी ही रेखा हैं,
कुछ बदशक्ल सी हैं ज़िन्दगी, अपनों के ही दंश से,
गुरुर उनको सिर्फ इसका हैं, सब चल रहा हैं उनके वंश से।

जलाई जा रही हूँ हर रोज, बदज़ुबानी की आग से,
कमबख्त कौन सी वो चीज़ हैं, जिसे पाने के लिए जीती हूँ,
घिरी अपनों से हूँ लेकिन, पराई मेरी काया हैं,
मुझे हररोज़ उन्हीं हाथों ने, रह-रह कर जलाया हैं।

दफनाई जा रही हैं हर-लम्हा, मेरी हसरतों की दुनिया,
खुली आँखों में मैंने भी तो, अपना आशियाना सजाया हैं,
कुछ ज़मी कम पड़ गयी, या कुछ कदम ठहर गये,
शायद ये ‘सब्र’ हैं मेरा, या ‘बेशर्म’ हम बन गये।

पराई दुनिया को छोड़कर, पराई दुनिया में आई हूँ,
कमी इतनी सी हैं ‘माही’, पहले ‘बेटी’ और आज ‘बहु’ होकर पराई हूँ,
हँसते हो रुलाकर मुझे, मुझे इसका भी गम नहीं,
ये गुरुर ‘बेटों, का हैं, या फिर ‘आँखों’ में शर्म नहीं?
या फिर ‘आँखों’ में शर्म नहीं?

मंजूमाहीराज
दिनांक: 28 जुलाई, 2016

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(c) समस्त सामग्री कापीराइटेड हैं।

 

बहुत समझा मुझे तुमने, की कुछ समझा ही नहीं!

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हूँ बेगुनाह मैं, या गुनेहगार हूँ तुझ संग,
तू झाँक खुद के सीने में, फिर जवाब दे मुझको!

आँखो के हसीन ख्वाब, हक़ीकत की ज़मी पे बिखर गये,
तू झाँक खुद की नज़रो में, फिर जवाब दे मुझको!

चन्द कदमो के तेरे साथ ने, मुझको थका दिया,
तू देख खुद की ज़मी, फिर जवाब दे मुझको!

तेरे प्यार में ‘माही’, टूटी है कई बार,
तू देख खुद के हौसले, फिर जवाब दे मुझको!

बहुत समझा मुझे तुमने, कि कुछ समझा ही नहीं ‘राज’,
फिर भी कहती हैं ये ‘माही’, आज जवाब दे मुझको!
आज जवाब दे मुझको!

मंजू “माहीराज”
दिनांक: 26 फ़रवरी, 2016
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थक गयी हुँ मैं मगर, टूटी नहीं हुँ जिंदगी !

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बहुत हसरतों से मैंने सज़ाई थी जिंदगी,
हर रिश्तों को रेशम धागे में, पिराई थी जिंदगी,
सज़ाने को चन्द उम्मीद, और ख़्वाहिश थी मेरे पास,
जिनकी सिसकियों से ही, डगमगाई थी जिंदगी!

न मैं कह सकी सबसे, न अपनों ने सुनी आवाज़,
पत्थर दिलों से मिलकर, पत्थराई थी जिंदगी,
मैं सोचती हुँ जितना, उतना ही टूट जाती हुँ,
क्योँ इस मोड़ पर मुझे यू, ले आई थी जिंदगी!

मेरा साया ही मुझको आज यू, मायूस कर गया,
हैँ आँसुओं की झील मेँ, डबडबाई थी जिंदगी,
हैँ उम्मीद अब भी बाकी, सीने मेँ दबी हुई,
थक गई हुँ मैं मगर, टूटी नहीं हुँ जिंदगी,
टूटी नहीं हुँ जिंदगी!

मंजू “माहीराज”
दिनांक: 11 नवम्बर, 2014
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क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ!

तेरे सुने आँगन में, अश्कों से भीगे आँचल में,
तेरी झूठी हर फटकार में, फिर मिलने वाले प्यार में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

तेरी बातों की मिठास में, तेरी हर दिन और रात में,
होने वाली हर परवाह में, मिलने वाली हर दुआ में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

तुझ संग होती हर बात में, हर क्षण होती मुलाकात में,
बुनते हुए हर ख्वाब में, सच होती हुई हर बात में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

तेरी उदासी के हर छोर में, भीगी आँखों के कोर में,
नतमस्तक होती हर भोर में, दौड़ती भागती जिंदगी के शोर में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

तेरे जीवन की तरंग में, हर उठने वाली उमंग में,
रिश्तों के नाज़ुक डोर में, तेरे जीवन के हर मोड़ में,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ I

“मैं” तेरी ही परछाई हूँ, तुझसे ही जन्म “मैं” पाई हूँ,
तेरे ममता के आँचल में, “पल” आज हुई पराई हूँ,
हर चीज में “मैं” समाई हूँ, क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ,
क्यों “माँ” मैं फिर भी पराई हूँ !

मंजू “माहीराज”
दिनांक: 30 अक्टूबर, 2013
समर्पित प्यारी “माँ”

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बगिया में खिला फूल कभी, कांटो की चुभन ना बन जाए !

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माँ का आँचल है बगिया, तो बापू माली सा दिखता है
बचपन का दुलार, क्यों जवानी में चुभता हैI

नन्हें कदमों की डगमगाहट, उँगली थाम कर सम्भलती है
क्यों जवानी में वो हथेली, हाथों से फिसलती हैI

जिनके सपनों को सजानें में, खुद की जवानी पिघलती है,
क्योँ उनकी तस्वीरों में, गैरों की परछाई सँवरती हैI

क्योँ झुरियों भरे चेहरे से वो आज भागते है
बचपन में जिसे प्यार से, वो माँ-बाबा पुकारते हैI

हैं कोशिश मैं सींचू वो बाग़, जिसका माली ना मुरझा पाएं,
बगिया में खिला फूल कभी, कांटो की चुभन ना बन जाए I

मंजू”माहीराज”
दिनांक: ०२-मार्च-2014
समर्पित नानी जी
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बहु को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो

बहु  को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो,
अपनों की थाली में कभी, खिला कर तो देखो,
बहुत सजाएं हैं सपने, उसने भी आँखों में,
उसकी उम्मीद को भी पंख, लगा कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी, बना कर तो देखो,

बहुत हँसती हैं वो देखो, भीगी आँख से  लेकिन,
कभी उसके भी ज़ख्मो पर, मरहम लगा कर तो देखो,
नहीं कहती हैं वो कुछ भी, बहुत जान कर सबको,
उसके भी होंटों पर, लफ्ज़ सजाकर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,

सिकवा नहीं हैं उसको, अपनों के छूट जाने का,
हाँ दर्द हैं बहुत, अपनों के ठुकराने का,
कभी ममता का आँचल, उसके सर पर ड़ाल कर तो देखो,
अपनों की तरह उसको भी अपना, मान कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,

क्यों रोती हैं वो अपनों के लिये, अपनों के ही घर में,
बहते हुयें अश्कों को उसके, पहचान कर तो देखो,
नहीं सँवरी  हैं वो, सँवार कर, बेजान चेहरों को,
कभी रिश्तों के तराज़ू से, उसे उतार कर तो देखो,
बहु  को भी बेटी कभी बना कर तो देखो,
अपनों की थाली में कभी, खिला कर तो देखो……..

मंजू ” माहीराज”
दिनांक : 22 अगस्त 2012

क्यू बेटी से बहु, बनाई जाती हैं बेटियां

क्यू बेटी से बहु, बनाई जाती हैं बेटियां,
क्यू अपनों से पराई, कहलाती हैं बेटियां,
क्यू अपना कर अनजान रिश्तो को,
उसी रंग में खो जाती हैं बेटियां,
क्यू बेटो की हर गलती की सज़ा पाती हैं बेटियां,

कभी रूठ कर ममता के आँचल में, मुह छुपाती थी जो बेटियां,
क्यू बन कर शोभा किसी आँगन की, उस आँचल को तरस जाती हैं बेटियां,
कभी माँ की लाडली, बापू की दुलारी, कहलाती थी जो बेटियां,
क्यू खोकर खुदको बहु-भाभी, बन कर रह जाती हैं बेटियां,

क्यू रिश्तों के तराज़ू में सिर्फ, तोली जाती हैं बेटियां,
क्यू बहु से बेटी और आँखों का तारा, नहीं बनाई जाती हैं बेटियां,
क्यू सबकी आँखों में खुशियाँ देकर, खुद खुश हो जाती हैं बेटियां,
क्यू उसके ही सपने टूटते हैं, क्यू मुरझा जाती हैं बेटियां,

मैं तलाश में हूँ उस बाग के, जिसमें बहु से बेटी बनाई जाती हैं बेटियां,
मैं थकी नहीं ”हाँ” निराश हूँ, क्यू हर रूप में नहीं अपनाई जाती हैं बेटियां

मंजू “माहीराज”
दिनाक 26 june 2012

हाँ मैं बोती हूँ तमन्ना….

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हाँ मैं  बोती हूँ तमन्ना, वीरान बंजर दिल की ज़मी में
हाँ मैं सजोती हूँ ख़्वाब, सुनी नम आँखों की गली में,

हाँ जागती  हूँ मैं रातों को, दिल की तन्हाई मिटाने के लिए
हाँ सिसकती हैं हर आहे, खुद को बहलाने के लिए,

हाँ हँसती हूँ मैं खुद पर, देख टूटे हुए टुकड़ों में खुदको
हाँ समेटती हूँ फिर काँपते हाथों से, अपनी ही रूह में खुदको,

हाँ अंजान थी मैं, नाज़ों नखरों और दुनियाँ  की नुमाईश से
हाँ  छुपाती थी खुद को और  हसरतों को, अपनी ही परछाई से,

हाँ बोती हूँ मैं बंजर ज़मी में
तमन्ना और ख़्वाबो के सूखे बीज़|

मंजू”माहीराज”

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