
तेरी खुशबू मेरे तन बदन को, आज भी महकाती हैं
तेरे उन अनछुए स्पर्श को, रोम-रोम में जगाती हैं,
कभी हथेलियों और कभी बालो को सहलाती हैं
कभी अठखेलिया करते हुए, सांसो को बहकाती हैं,
कभी ये दूर से मचलते हुए, अरमा जगाती हैं
कभी अधखुली आँखो में मेरी, ख्वाबो को सजाती हैं,
कभी झींझोर कर मुझको, तेरी यादों के दामन से
तेरे ना साथ होने की चुभन, दिल में बढ़ाती हैं,
तेरी खुशबू मेरे तन बदन को आज भी महकाती हैं……………..
मंजू”माहीराज”