हाँ मैं बोती हूँ तमन्ना, वीरान बंजर दिल की ज़मी में
हाँ मैं सजोती हूँ ख़्वाब, सुनी नम आँखों की गली में,
हाँ जागती हूँ मैं रातों को, दिल की तन्हाई मिटाने के लिए
हाँ सिसकती हैं हर आहे, खुद को बहलाने के लिए,
हाँ हँसती हूँ मैं खुद पर, देख टूटे हुए टुकड़ों में खुदको
हाँ समेटती हूँ फिर काँपते हाथों से, अपनी ही रूह में खुदको,
हाँ अंजान थी मैं, नाज़ों नखरों और दुनियाँ की नुमाईश से
हाँ छुपाती थी खुद को और हसरतों को, अपनी ही परछाई से,
हाँ बोती हूँ मैं बंजर ज़मी में
तमन्ना और ख़्वाबो के सूखे बीज़|
मंजू”माहीराज”

